सऊदी अरब में दो बांग्लादेशी नागरिकों को मौत की सजा दिए जाने के बाद बांग्लादेश की कांसुलर और राजनयिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। इसी दौरान श्रीलंका के नागरिक अनोझान शिवरासा की मौत की सजा सऊदी सुप्रीम कोर्ट ने पलट दी। दोनों घटनाक्रम लगभग एक ही समय सामने आने से यह सवाल उठ रहा है कि श्रीलंका की कानूनी और राजनयिक रणनीति ने अपने नागरिक को राहत दिलाने में क्या भूमिका निभाई और बांग्लादेश के मामले में स्थिति अलग क्यों रही।
सऊदी में दो बांग्लादेशी नागरिकों को दी गई मौत की सजा
सऊदी अधिकारियों ने 14 अक्टूबर को दो बांग्लादेशी नागरिकों के निष्पादन की घोषणा की। उनकी पहचान नज़रुल इस्लाम अब्दुल बासिर और स्वीटी अख्तर के रूप में हुई है।
सऊदी गृह मंत्रालय के मुताबिक दोनों को मक्का में एक मस्जिद के अंदर कथित तौर पर अशोभनीय कृत्य से जुड़े मामले में दोषी ठहराया गया था। सऊदी अधिकारियों ने बताया कि सजा ताज़ीर के तहत दी गई और न्यायिक प्रक्रिया के बाद इसे लागू किया गया।
हालांकि, बाद में सामने आए बांग्लादेशी कांसुलेट के दस्तावेजों के मुताबिक दोनों अगस्त 2023 से हिरासत में थे और उनके खिलाफ अलग-अलग आरोप दर्ज थे। कांसुलर दस्तावेजों में नज़रुल के मामले में साइबर अपराध कानून और स्वीटी के मामले में व्यभिचार से जुड़ा आरोप दर्ज होने की बात सामने आई।
ढाका को फांसी की जानकारी पहले क्यों नहीं मिली?
बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबैद ने कहा कि सरकार और सऊदी स्थित बांग्लादेशी मिशन को 14 अक्टूबर को ही पता चला कि दोनों नागरिकों की मौत की सजा लागू कर दी गई है।
बांग्लादेश ने बाद में सऊदी राजदूत से मामले की विस्तृत जानकारी मांगी और फैसलों तथा मामले से जुड़े दस्तावेजों के बारे में आधिकारिक जानकारी हासिल करने की प्रक्रिया शुरू की।
बांग्लादेशी अधिकारियों के मुताबिक सऊदी पक्ष ने फांसी से पहले मिशन को इसकी सूचना नहीं दी थी।
इसी बीच श्रीलंका ने अपने नागरिक के लिए क्या किया?
इसी समय श्रीलंकाई नागरिक अनोझान शिवरासा का मामला बिल्कुल अलग दिशा में गया।
सऊदी अरब की एक अदालत ने सोशल मीडिया पर की गई कथित आपत्तिजनक पोस्ट से जुड़े मामले में पहले उन्हें पांच साल की जेल की सजा सुनाई थी। बाद में अपील अदालत ने मौत की सजा सुना दी। Human Rights Watch के अनुसार, यह मामला फेसबुक पर पैगंबर मोहम्मद के अपमान के आरोप से जुड़ा था।
इसके बाद श्रीलंका ने कानूनी और राजनयिक दोनों स्तरों पर हस्तक्षेप किया।
श्रीलंका ने उठाए कौन से कदम?
श्रीलंका की ओर से मामले में विशेष कानूनी टीम सक्रिय की गई। श्रीलंकाई राजदूत ने जेल में शिवरासा से मुलाकात की और कानूनी प्रक्रिया में मदद की गई।
श्रीलंकाई कानूनी प्रतिनिधिमंडल ने सऊदी अरब पहुंचकर सुप्रीम कोर्ट में अपील की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। इसके बाद 13 अक्टूबर को सऊदी सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा वाले फैसले को पलट दिया।
हालांकि, मौत की सजा हटने का मतलब यह नहीं है कि शिवरासा का पूरा मामला समाप्त हो गया है। रिपोर्टों के अनुसार आगे की कानूनी प्रक्रिया बाकी है।
क्या यही है श्रीलंका की ‘सफल रणनीति’?
दोनों मामलों की तुलना करते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि अपराधों, अदालतों के फैसलों और कानूनी परिस्थितियों में अंतर है। इसलिए सीधे यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि केवल कूटनीतिक हस्तक्षेप के कारण एक व्यक्ति की सजा बदली और दूसरे की नहीं।
लेकिन उपलब्ध रिपोर्टों से यह जरूर पता चलता है कि श्रीलंका ने शिवरासा के मामले में राजनयिक संपर्क, राजदूत स्तर की पहल और विशेषज्ञ कानूनी सहायता को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया।
वहीं बांग्लादेश के मामले में सरकार का कहना है कि उसे निष्पादन की जानकारी पहले नहीं दी गई थी और अब वह सऊदी अधिकारियों से विस्तृत जानकारी मांग रही है।



























