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नेहा बोरा को क्यों भरना होगा Peace Bond? ₹10 हजार का बॉन्ड क्या है, साइन नहीं किया तो क्या होगा?

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नेहा बोरा Peace Bond मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला
नेहा बोरा Peace Bond मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला

दिल्ली हाई कोर्ट ने आइसा नेता नेहा बोरा की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) की ओर से जारी उस नोटिस को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें शांति बनाए रखने के लिए ₹10,000 का पीस बॉन्ड भरने और एक जमानती पेश करने को कहा गया था।

न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद ने मामले की सुनवाई करते हुए इस स्तर पर याचिका खारिज कर दी। हालांकि, कोर्ट ने मजिस्ट्रेट को कुछ निर्देश भी दिए हैं, जिसमें संबंधित सामग्री उपलब्ध कराने की बात शामिल है।

आखिर Peace Bond क्या होता है?

Peace Bond यानी शांति बनाए रखने का बॉन्ड किसी अपराध की सजा नहीं होता। यह एक तरह का निवारक कानूनी उपाय है। इसका उद्देश्य ऐसी स्थिति में सार्वजनिक शांति बनाए रखना है, जब प्रशासन को किसी व्यक्ति की गतिविधियों से शांति भंग होने की आशंका हो।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 126 के तहत कुछ परिस्थितियों में कार्यपालिका मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति से एक निश्चित अवधि तक शांति बनाए रखने के लिए बॉन्ड भरने को कह सकता है।

इसमें व्यक्ति लिखित रूप से यह सुनिश्चित करता है कि वह तय अवधि के दौरान ऐसी गतिविधि नहीं करेगा जिससे सार्वजनिक शांति भंग होने की स्थिति पैदा हो।

नेहा बोरा के मामले में क्या हुआ?

नेहा बोरा को चुनाव आयोग के खिलाफ प्रस्तावित विरोध मार्च के दौरान SEM कोर्ट की ओर से नोटिस जारी किया गया था। उन्हें मजिस्ट्रेट के सामने पेश होकर ₹10,000 का Peace Bond भरने और एक जमानती देने को कहा गया था।

बोरा ने इस कार्रवाई को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी है।

उन्हें 16 अक्टूबर को हिरासत में लिया गया था। बताया गया कि वह ‘लहरा दो तिरंगा’ मार्च में शामिल होने जा रही थीं। अगले दिन 17 अक्टूबर को उन्हें रिहा कर दिया गया था।

Peace Bond की अवधि कितनी हो सकती है?

ऐसे मामलों में शांति बनाए रखने के लिए लिया गया बॉन्ड कानून में निर्धारित अवधि के लिए हो सकता है। BNSS की धारा 126 के तहत इसकी अधिकतम अवधि एक साल तक हो सकती है।

इसका मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति के सभी अधिकार खत्म हो जाते हैं। व्यक्ति को सिर्फ बॉन्ड में तय शर्तों और लागू कानूनी आदेशों का पालन करना होता है।

अगर Peace Bond पर साइन करने से मना कर दें तो?

यही इस मामले का सबसे अहम सवाल है।

BNSS की संबंधित प्रक्रिया के तहत यदि व्यक्ति आवश्यक बॉन्ड भरने से इनकार करता है या निर्धारित जमानती पेश नहीं कर पाता, तो उसे हिरासत में लेने की स्थिति बन सकती है। ऐसी स्थिति में मजिस्ट्रेट कानून के अनुसार आगे की हिरासत का आदेश दे सकता है।

इसलिए Peace Bond को सिर्फ एक सामान्य कागज समझकर नजरअंदाज करना उचित नहीं है। किसी व्यक्ति को बॉन्ड की शर्तों और मजिस्ट्रेट के आदेश को ध्यान से समझना जरूरी होता है।

बॉन्ड का उल्लंघन करने पर क्या होगा?

अगर संबंधित प्राधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि व्यक्ति ने Peace Bond की शर्तों का उल्लंघन किया है, तो BNSS के प्रावधानों के तहत उसके खिलाफ आगे की कार्रवाई हो सकती है।

कुछ परिस्थितियों में मजिस्ट्रेट व्यक्ति की गिरफ्तारी और शेष अवधि के लिए हिरासत से संबंधित आदेश भी दे सकता है।

हालांकि, किसी खास मामले में क्या कार्रवाई होगी, यह बॉन्ड की शर्तों, अदालत/मजिस्ट्रेट के आदेश और मामले के तथ्यों पर निर्भर करता है।

SEM यानी Special Executive Magistrate कौन होता है?

Special Executive Magistrate यानी SEM न्यायिक मजिस्ट्रेट से अलग होता है। ये अधिकारी प्रशासनिक व्यवस्था के तहत कार्य करते हैं और कानून द्वारा उन्हें कुछ विशेष कार्यकारी शक्तियां दी जा सकती हैं।

दिल्ली में पुलिस अधिकारियों को भी कुछ परिस्थितियों में SEM की शक्तियां प्रदान की जाती हैं। इसी वजह से प्रदर्शन और सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े मामलों में SEM की भूमिका चर्चा में आती रही है।

दिल्ली हाई कोर्ट पहले भी उठा चुका है सवाल

दिल्ली हाई कोर्ट ने 2018 के एक फैसले में इन प्रावधानों के इस्तेमाल को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणियां की थीं। अदालत ने इस बात पर चिंता जताई थी कि इन शक्तियों के इस्तेमाल का असर आर्थिक रूप से कमजोर और अन्य वंचित वर्गों पर ज्यादा पड़ सकता है, खासकर तब जब कोई व्यक्ति जमानती या निर्धारित राशि की व्यवस्था करने में सक्षम न हो।

इसलिए Peace Bond का उद्देश्य केवल किसी व्यक्ति को दंडित करना नहीं, बल्कि संभावित रूप से सार्वजनिक शांति भंग होने की स्थिति को रोकना है।

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