
नई दिल्ली: भारत में रजिस्टर्ड गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टियों यानी RUPP (Registered Unrecognised Political Parties) की फंडिंग को लेकर एक रिपोर्ट में गंभीर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ ऐसी राजनीतिक पार्टियों को 2023-24 में सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा मिला, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बेहद कम उम्मीदवार मैदान में उतारे।
बीबीसी में प्रकाशित शुभांगी मिश्रा की रिपोर्ट के मुताबिक, 2023-24 में सबसे ज्यादा चंदा पाने वाली छह RUPP की कुल आय, बीजेपी को छोड़कर बाकी पांच राष्ट्रीय पार्टियों की कुल आय से ज्यादा थी। इसके बावजूद इन छह पार्टियों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में मिलकर सिर्फ 15 उम्मीदवार उतारे।
रिपोर्ट में इन पार्टियों के दफ्तर, चुनावी गतिविधियों और चंदे के इस्तेमाल को लेकर पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए गए हैं।
620 करोड़ रुपये का चंदा और सिर्फ एक उम्मीदवार
इन पार्टियों में आम जनमत पार्टी को सबसे ज्यादा चंदा मिलने की बात सामने आई है। रिपोर्ट के मुताबिक, 2020 में पटना में बनी इस पार्टी को शुरुआती दो वर्षों में 20 हजार रुपये से ज्यादा का चंदा नहीं मिला था।
लेकिन 2022-23 में पार्टी को करीब 216 करोड़ रुपये और 2023-24 में करीब 620 करोड़ रुपये का चंदा मिला। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सिर्फ एक उम्मीदवार मैदान में उतारा।
रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी की संस्थापक अध्यक्ष अनामिका पासवान ने दावा किया कि उन्होंने 2022 में पार्टी से इस्तीफा दे दिया था। उनके अनुसार पार्टी का आधार पटना से अहमदाबाद स्थानांतरित हो गया था।
अहमदाबाद में पार्टी का रजिस्टर्ड ऑफिस बंद मिलने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है।
गुजरात में बंद मिले कई राजनीतिक दलों के दफ्तर
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि सबसे ज्यादा चंदा पाने वाली छह RUPP में से चार के रजिस्टर्ड ऑफिस अहमदाबाद के नरोड़ा इलाके में हैं, जबकि बाकी दो भी गुजरात में स्थित बताए गए हैं।
सत्यवादी रक्षक पार्टी का रजिस्टर्ड ऑफिस आनंद शहर में एक फ्लैट में बताया गया। मौके पर पार्टी का बोर्ड या पोस्टर नहीं मिला और फ्लैट पर ताला लगा हुआ था।
रिपोर्ट के मुताबिक, इस पार्टी को 2023-24 में करीब 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने केवल एक उम्मीदवार उतारा।
330 करोड़ का चंदा, चुनाव प्रचार पर 8.48 करोड़ खर्च
सत्यवादी रक्षक पार्टी के रिकॉर्ड के मुताबिक, 2023-24 में पार्टी को करीब 330 करोड़ रुपये का चंदा मिला। ऑडिट रिपोर्ट में चुनाव प्रचार पर करीब 8.48 करोड़ रुपये खर्च किए जाने की जानकारी दी गई।
वहीं, करीब 316 करोड़ रुपये ‘जनकल्याण’ के नाम पर खर्च किए जाने की बात रिपोर्ट में सामने आई।
पार्टी अध्यक्ष स्वाति बेन से चंदे के इस्तेमाल को लेकर सवाल पूछे जाने पर कथित तौर पर कहा गया कि पैसा चैरिटी में खर्च किया गया, लेकिन उसका रिकॉर्ड नहीं रखा गया।
गरीब कल्याण पार्टी को मिले 138 करोड़
रिपोर्ट के मुताबिक, गरीब कल्याण पार्टी को 2023-24 में करीब 138 करोड़ रुपये का चंदा मिला था। पार्टी ने 2024 के लोकसभा चुनाव में तीन उम्मीदवार उतारे।
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि अहमदाबाद स्थित पार्टी का ऑफिस भी बंद मिला। पार्टी अध्यक्ष नीरज कुमार क्षत्रिय की मां ने कथित तौर पर कहा कि उन्हें पार्टी के कामकाज की जानकारी नहीं है।
उन्होंने यह भी बताया कि इनकम टैक्स विभाग ने उनके घर पर छापेमारी की थी।
टैक्स छूट और राजनीतिक चंदे के इस्तेमाल पर सवाल
राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे और टैक्स छूट की व्यवस्था को लेकर भी विशेषज्ञों तथा टैक्स अधिकारियों ने सवाल उठाए हैं।
रिपोर्ट में अहमदाबाद के चार्टर्ड अकाउंटेंट महेश छाजेड़ के हवाले से बताया गया है कि कुछ मामलों में टैक्सपेयर्स राजनीतिक पार्टियों को चंदा देते हैं, उसकी रसीद के आधार पर टैक्स लाभ लेते हैं और आरोप है कि पार्टी अपना कमीशन काटकर बाकी रकम नकद में वापस कर देती है।
हालांकि, किसी खास पार्टी के खिलाफ इस तरह के आरोपों को साबित करने के लिए संबंधित जांच और आधिकारिक कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी।
इनकम टैक्स विभाग ने RUPP में वित्तीय अनियमितताओं का मुद्दा उठाया
रिपोर्ट में इनकम टैक्स विभाग की दिसंबर 2025 की प्रेस रिलीज का भी उल्लेख किया गया है। इसके मुताबिक, कुछ RUPP का इस्तेमाल कथित तौर पर फंड ट्रांसफर, हवाला लेन-देन, सीमा-पार रेमिटेंस और फर्जी डोनेशन रसीदों के लिए किए जाने की बात सामने आई थी।
ADR की रिसर्चर शैली महाजन ने भी सवाल उठाया कि अगर कोई राजनीतिक पार्टी चुनावी तौर पर सक्रिय नहीं है, लेकिन उसे सैकड़ों करोड़ रुपये का फंड मिल रहा है, तो उसके कामकाज और फंड के स्रोत की जांच जरूरी है।
चार्टर्ड अकाउंटेंट की भूमिका पर भी सवाल
रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ टैक्स अधिकारियों ने दावा किया कि कई RUPP स्वतंत्र रूप से काम नहीं करतीं और उनके बीच किसी तरह का आपसी संबंध हो सकता है।
कुछ मामलों में चार्टर्ड अकाउंटेंट के राजनीतिक पार्टियों और टैक्सपेयर्स के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाने के आरोप भी सामने आए हैं।
स्वतंत्रता अभिव्यक्ति पार्टी के अध्यक्ष सुरेंद्र तिवारी ने भी दावा किया कि उनकी पार्टी को 2023-24 में करीब 219 करोड़ रुपये मिले, लेकिन उन्हें इस रकम के इस्तेमाल का अधिकार नहीं था।
उन्होंने पार्टी के चार्टर्ड अकाउंटेंट पर आरोप लगाए। हालांकि, चार्टर्ड अकाउंटेंट मयूर सिंह ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया और कहा कि उनकी भूमिका पार्टियों की अनिवार्य ऑडिट रिपोर्ट चुनाव आयोग में जमा करने तक सीमित है।
5,591 करोड़ रुपये के कथित फर्जी डोनेशन का दावा
रिपोर्ट में एक इंटरनल डोजियर के हवाले से दावा किया गया है कि इनकम टैक्स विभाग ने टैक्स छूट हासिल करने के लिए RUPP को दिए गए करीब 5,591 करोड़ रुपये के कथित फर्जी डोनेशन की पहचान की है।
इनमें से करीब 2,749 करोड़ रुपये की वसूली किए जाने का दावा भी किया गया है। इसके अलावा RUPP से जुड़े करीब 665 करोड़ रुपये के विदेशी लेन-देन की पहचान किए जाने की बात कही गई है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन आंकड़ों की स्वतंत्र पुष्टि के लिए पूछे गए सवालों का इनकम टैक्स विभाग और CBDT की ओर से जवाब नहीं मिला था।
चुनाव आयोग ने 800 से ज्यादा RUPP को हटाया था
पिछले साल चुनाव आयोग ने 800 से ज्यादा RUPP को अपनी सूची से हटाने की कार्रवाई की थी। आयोग के मुताबिक, इन पार्टियों ने पिछले छह वर्षों में किसी भी चुनाव में एक भी उम्मीदवार नहीं उतारा था।
हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि उस कार्रवाई में वित्तीय अनियमितताओं को भी आधार बनाया गया था या नहीं।
करोड़ों का चंदा और कम चुनावी सक्रियता क्यों बड़ा सवाल है?
पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर कोई राजनीतिक पार्टी चुनावी राजनीति में बेहद सीमित रूप से सक्रिय है, तो उसे सैकड़ों करोड़ रुपये का चंदा कैसे और क्यों मिल रहा है?
RUPP की संख्या देश में हजारों में है, जबकि राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय मान्यता प्राप्त पार्टियों की संख्या काफी कम है। ऐसे में राजनीतिक फंडिंग में पारदर्शिता, चंदे के स्रोत और उसके इस्तेमाल की निगरानी का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है।
फिलहाल जिन पार्टियों और व्यक्तियों पर रिपोर्ट में सवाल या आरोप सामने आए हैं, उनके संबंध में अंतिम निष्कर्ष संबंधित जांच एजेंसियों, आधिकारिक दस्तावेजों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही तय होंगे।


























