पंजाब की सियासत में शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच दोबारा गठबंधन की अटकलें एक बार फिर तेज हो गई हैं। अकाली दल प्रमुख सुखबीर सिंह बादल और पंजाब के भाजपा चुनाव प्रभारी एवं केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल के बीच हुई अहम मुलाकात के बाद राजनीतिक गलियारों में संभावित गठजोड़ को लेकर चर्चा बढ़ गई है।
दोनों दलों के नेताओं के बीच पिछले कुछ समय से बढ़ती नजदीकियों को आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव के नजरिए से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, अभी तक गठबंधन को लेकर दोनों पार्टियों की ओर से कोई अंतिम आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।
सुखबीर बादल-सीआर पाटिल की मुलाकात क्यों अहम?
सूत्रों के मुताबिक, दिल्ली में सुखबीर सिंह बादल और सीआर पाटिल के बीच हुई बैठक काफी देर तक चली। माना जा रहा है कि बातचीत में आगामी विधानसभा चुनाव की रणनीति और संभावित गठबंधन के लिए साझा मुद्दों पर चर्चा हुई।
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि दोनों दल किसी Common Minimum Programme यानी साझा न्यूनतम कार्यक्रम को आधार बनाकर आगे बढ़ने की संभावनाओं पर विचार कर रहे हैं।
हालांकि, सीटों के बंटवारे को लेकर भी चर्चा होने की बात कही जा रही है, लेकिन इस पर अंतिम फैसला अभी बाकी है। माना जा रहा है कि सीट शेयरिंग को लेकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और अकाली दल के वरिष्ठ नेताओं के बीच आगे होने वाली बैठकों के बाद तस्वीर साफ हो सकती है।
रक्खड़ पुन्निया मेले में भी दिखी नरमी
दोनों दलों के बीच बढ़ती नजदीकी की चर्चा ऐसे समय में हो रही है जब शुक्रवार को रक्खड़ पुन्निया के मौके पर दोनों पार्टियों ने अलग-अलग राजनीतिक कार्यक्रम आयोजित किए।
हालांकि SAD और BJP ने अपने-अपने मंचों से शक्ति प्रदर्शन किया, लेकिन दोनों तरफ से एक-दूसरे के खिलाफ तीखे हमले देखने को नहीं मिले।
राजनीतिक विश्लेषकों के बीच इसे दोनों दलों के रिश्तों में आई संभावित नरमी के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि दोनों पार्टियां औपचारिक गठबंधन की ओर बढ़ रही हैं या केवल चुनावी संभावनाओं को लेकर बातचीत कर रही हैं।
मोदी से मुलाकात के बाद बदला अकाली दल का रुख?
सुखबीर बादल की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संसद सत्र के दौरान हुई मुलाकात को भी इस पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।
इसके बाद अकाली दल की ओर से महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे मुद्दों पर रुख में बदलाव की चर्चा हुई। वहीं, संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की बरसी के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल ने भी दिल्ली के साथ रिश्तों को लेकर सकारात्मक संकेत दिए थे।
इन घटनाओं के बाद SAD-BJP के संभावित गठबंधन की अटकलों को और हवा मिली है।
ढाई दशक पुराना गठबंधन क्यों टूटा था?
SAD और BJP लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में गठबंधन सहयोगी रहे हैं। दोनों पार्टियों का गठबंधन करीब ढाई दशक तक चला।
लेकिन किसान आंदोलन के दौरान दोनों दलों के बीच मतभेद बढ़ गए। अकाली दल ने सितंबर 2020 में कृषि कानूनों को लेकर भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ दिया था।
अकाली दल का प्रमुख वोट बैंक माने जाने वाले किसानों के बीच कृषि कानूनों को लेकर नाराजगी के बाद पार्टी ने भाजपा से दूरी बना ली थी। इसके बाद दोनों पार्टियों ने अलग-अलग चुनाव लड़े।
अब पंजाब की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों में दोनों दलों के फिर करीब आने की संभावनाएं चर्चा का विषय बनी हुई हैं।
सीआर पाटिल की नियुक्ति के बाद बढ़ी राजनीतिक हलचल
भाजपा ने हाल ही में केंद्रीय मंत्री सीआर पाटिल को पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी का प्रभारी नियुक्त किया है।
पाटिल को भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के करीबी नेताओं में गिना जाता है। उनकी पंजाब में जिम्मेदारी तय होने के बाद SAD-BJP संबंधों को लेकर राजनीतिक गतिविधियों में तेजी देखी जा रही है।
कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सीआर पाटिल और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू के साथ दिल्ली में बैठक भी की थी। इसके बाद पंजाब की राजनीति में भाजपा की चुनावी रणनीति को लेकर चर्चाएं और तेज हुईं।
सीट शेयरिंग बनेगी सबसे बड़ी चुनौती?
अगर दोनों दल गठबंधन की दिशा में आगे बढ़ते हैं तो सबसे बड़ी चुनौती सीटों के बंटवारे को लेकर हो सकती है।
पंजाब में भाजपा और अकाली दल के बीच पुराने गठबंधन के दौरान सीटों का एक निश्चित समीकरण रहा था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में दोनों पार्टियों की राजनीतिक स्थिति और चुनावी ताकत में बदलाव आया है।
ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अगर गठबंधन बनता है तो दोनों दल किस फॉर्मूले पर सीटों का बंटवारा करते हैं।
AAP और कांग्रेस की बढ़ेगी चिंता?
SAD-BJP के दोबारा साथ आने की स्थिति में इसका सीधा असर पंजाब की मौजूदा राजनीतिक तस्वीर पर पड़ सकता है।
सत्ता में मौजूद आम आदमी पार्टी (AAP) के साथ-साथ कांग्रेस और अन्य दलों को भी अपनी चुनावी रणनीति में बदलाव करना पड़ सकता है।
अकाली दल का पारंपरिक ग्रामीण और सिख वोट बैंक तथा भाजपा का शहरी और हिंदू मतदाताओं के बीच प्रभाव अगर एक मंच पर आता है तो यह चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
हालांकि, यह भी देखना होगा कि किसान मुद्दे समेत पिछले कुछ वर्षों में दोनों दलों के बीच पैदा हुए मतभेद कितने दूर हो पाए हैं।
अभी आधिकारिक ऐलान का इंतजार
सुखबीर बादल और सीआर पाटिल की मुलाकात ने गठबंधन की चर्चाओं को जरूर मजबूत किया है, लेकिन फिलहाल SAD-BJP गठबंधन पर अंतिम मुहर नहीं लगी है।
अब सभी की नजरें दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व के बीच होने वाली अगली बैठकों पर हैं। खासतौर पर सीट शेयरिंग और साझा चुनावी एजेंडे पर सहमति बनने के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि पंजाब में कभी लंबे समय तक साथ रहे SAD और BJP एक बार फिर चुनावी मैदान में एक साथ उतरेंगे या नहीं।






















