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मौत की सजा के लिए फांसी ही रहेगी तरीका, सुप्रीम कोर्ट ने वैकल्पिक व्यवस्था की याचिका खारिज की

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मौत की सजा के लिए फांसी ही रहेगी तरीका, सुप्रीम कोर्ट ने वैकल्पिक व्यवस्था की याचिका खारिज की
मौत की सजा के लिए फांसी ही रहेगी तरीका, सुप्रीम कोर्ट ने वैकल्पिक व्यवस्था की याचिका खारिज की

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को मौत की सजा पाने वाले दोषियों को फांसी देने के मौजूदा प्रावधान को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी। याचिका में फांसी की जगह कम पीड़ादायक और अधिक मानवीय माने जाने वाले तरीकों को अपनाने की मांग की गई थी।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि फिलहाल भारत में मृत्युदंड पर अमल के लिए फांसी का तरीका ही जारी रहेगा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में नए वैज्ञानिक, चिकित्सकीय या अनुभवजन्य साक्ष्य सामने आने पर इस मुद्दे की संवैधानिक समीक्षा की संभावना बनी रहेगी।

फांसी की जगह दूसरे तरीके अपनाने की मांग

वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर याचिका में फांसी को चुनौती देते हुए मौत की सजा के लिए वैकल्पिक तरीकों पर विचार करने की मांग की गई थी। याचिका में तर्क दिया गया कि मृत्युदंड को इस तरह लागू किया जाना चाहिए जिससे दोषी को कम से कम पीड़ा हो और उसकी गरिमा भी बनी रहे।

याचिका में फांसी की जगह अन्य विकल्पों पर विचार करने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता ने यह भी अनुरोध किया था कि इस मामले से जुड़े पहले के फैसलों को बड़ी पीठ के पास भेजा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को भी स्वीकार नहीं किया।

कोर्ट ने भविष्य के लिए रास्ता खुला रखा

सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए यह साफ किया कि इसका मतलब यह नहीं है कि भविष्य में फांसी की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाने का रास्ता पूरी तरह बंद हो गया है।

अदालत के मुताबिक, अगर भविष्य में ऐसे ठोस वैज्ञानिक, मेडिकल या अनुभव-आधारित प्रमाण सामने आते हैं, जिनसे यह साबित हो कि वैकल्पिक तरीकों में कम पीड़ा होती है और मौजूदा व्यवस्था के आधार में महत्वपूर्ण बदलाव आया है, तो इस मुद्दे पर दोबारा संवैधानिक जांच की जा सकती है।

केंद्र सरकार विकल्पों पर कर सकती है विचार

कोर्ट ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार चाहे तो मौत की सजा को लागू करने के वैकल्पिक तरीकों का अध्ययन करने के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित कर सकती है।

इससे पहले केंद्र सरकार ने अदालत को बताया था कि इस विषय पर विचार के लिए एक समिति गठित की गई है। सुनवाई के दौरान सरकार की ओर से यह भी कहा गया था कि मौत की सजा के तरीके में बदलाव एक नीतिगत विषय है।

याचिका में क्या तर्क दिया गया था?

याचिकाकर्ता की ओर से फांसी को अत्यधिक पीड़ादायक और अमानवीय बताते हुए इसे संविधान के अनुच्छेद 21 में मिले जीवन और गरिमा के अधिकार के संदर्भ में चुनौती दी गई थी।

याचिका में यह भी तर्क दिया गया था कि दुनिया के कुछ देशों में मृत्युदंड के लिए अलग-अलग तरीकों का इस्तेमाल किया जाता है और भारत में भी कम पीड़ादायक विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए।

फिलहाल फांसी का तरीका बरकरार

सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले के बाद भारत में मौत की सजा पर अमल के लिए फांसी का मौजूदा तरीका फिलहाल बरकरार रहेगा। हालांकि, अदालत ने भविष्य में नए वैज्ञानिक और चिकित्सकीय प्रमाण सामने आने पर इस व्यवस्था की समीक्षा की संभावना को खुला रखा है।

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