
सौरभ राजपूत हत्याकांड में दोषी ठहराए गए मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद अब सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर दोनों को फांसी कब होगी?
फिलहाल फांसी की कोई निश्चित तारीख तय नहीं हुई है। मृत्युदंड पर अमल से पहले मामले को कई महत्वपूर्ण कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।
पहला पड़ाव: हाई कोर्ट की मंजूरी
सत्र न्यायालय द्वारा सुनाई गई मृत्युदंड की सजा को सीधे लागू नहीं किया जा सकता। मृत्युदंड के मामलों में हाई कोर्ट की पुष्टि जरूरी होती है।
हाई कोर्ट मामले के रिकॉर्ड, सबूतों और निचली अदालत के फैसले की न्यायिक समीक्षा करेगा। इसके बाद ही सजा की पुष्टि या उसमें बदलाव का रास्ता साफ होगा।
दूसरा पड़ाव: सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
अगर हाई कोर्ट मृत्युदंड की पुष्टि करता है तो दोषियों के पास सुप्रीम कोर्ट का रुख करने का विकल्प रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट मामले की सुनवाई के दौरान मृत्युदंड को बरकरार रख सकता है या परिस्थितियों के आधार पर सजा में बदलाव भी कर सकता है।
इसलिए हाई कोर्ट की पुष्टि के बाद भी तुरंत फांसी की तारीख तय होना जरूरी नहीं है।
तीसरा पड़ाव: राष्ट्रपति के सामने दया याचिका
न्यायिक विकल्पों के बाद दोषियों के पास राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल करने का संवैधानिक विकल्प भी होता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत राष्ट्रपति को मृत्युदंड के मामलों में क्षमादान और सजा से संबंधित कुछ संवैधानिक शक्तियां प्राप्त हैं।
आखिर फांसी कब होगी?
अभी यह कहना संभव नहीं है कि मुस्कान और साहिल को फांसी किस तारीख को दी जाएगी।
अगर हाई कोर्ट मृत्युदंड की पुष्टि करता है, सुप्रीम कोर्ट में उपलब्ध कानूनी विकल्पों से कोई राहत नहीं मिलती और दया याचिका की प्रक्रिया भी पूरी हो जाती है, तभी सजा के अमल की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है।
यानी मृत्युदंड सुनाए जाने और फांसी दिए जाने के बीच कई कानूनी पड़ाव होते हैं।



























