भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को लेकर विवाद एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहुंच गया है। भारत ने 31 अगस्त 2026 को हेग स्थित Court of Arbitration के उस फैसले को स्वीकार करने से इनकार कर दिया, जिसमें 1960 की सिंधु जल संधि को लागू रखने की बात कही गई थी। भारत का कहना है कि इस मध्यस्थता निकाय को भारत के संप्रभु फैसलों पर अधिकार ही नहीं है। विदेश मंत्रालय ने दोहराया कि सिंधु जल संधि को “abeyance” में रखने का भारत का फैसला प्रभावी है।
अब इसी विवाद से जुड़ा एक नया घटनाक्रम संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में सामने आया है। सितंबर 2026 में दिल्ली स्थित एक भारतीय NGO ने UNHRC के 63वें सत्र में सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग उठाई। संगठन ने पानी की सुरक्षा और सुरक्षित पेयजल को मानवाधिकारों से जोड़ते हुए कहा कि 1960 में बनी संधि को मौजूदा परिस्थितियों के संदर्भ में फिर से देखने की जरूरत है।
1960 में हुई थी भारत-पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि
भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे। विश्व बैंक ने इस समझौते की बातचीत में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी। संधि के तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह प्रमुख नदियों को दो हिस्सों में बांटा गया। रावी, ब्यास और सतलुज को मुख्य रूप से भारत के उपयोग के लिए और सिंधु, झेलम और चिनाब को पाकिस्तान के लिए निर्धारित किया गया, हालांकि पश्चिमी नदियों पर भारत को भी संधि के तहत कुछ निर्धारित उपयोगों की अनुमति है।
भारत ने कब और क्यों संधि को ‘Abeyance’ में रखा?
22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने कई कदम उठाए। 23 अप्रैल 2025 को भारत सरकार ने सिंधु जल संधि को तत्काल प्रभाव से abeyance में रखने का फैसला किया और कहा कि इसे तब तक बहाल नहीं किया जाएगा जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के समर्थन से विश्वसनीय और स्थायी रूप से पीछे नहीं हटता।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत ने संधि को “abeyance” में रखने की घोषणा की थी, जबकि पाकिस्तान द्वारा अप्रैल 2025 में इसे एकतरफा suspend करने की बात कहना सही नहीं होगा।
हेग की कोर्ट ने क्या कहा था?
31 अगस्त 2026 को हेग स्थित Court of Arbitration ने सिंधु जल संधि की स्थिति को लेकर अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि संधि लागू है और भारत को इसके तहत अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। साथ ही रतले हाइड्रोइलेक्ट्रिक परियोजना से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर अंतरिम उपाय भी जारी किए गए।
भारत ने इस फैसले को स्वीकार नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने इस Court of Arbitration को मान्यता नहीं दी है और वह इसे संधि की शर्तों के अनुरूप गठित नहीं मानता। भारत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिंधु जल संधि को abeyance में रखने का उसका फैसला कायम है।
अब UNHRC में क्यों उठा मामला?
15 सितंबर 2026 को एक भारतीय NGO ने UNHRC के 63वें सत्र में पानी और स्वच्छता के मानवाधिकारों से जुड़े संवाद के दौरान सिंधु जल संधि की समीक्षा की मांग रखी। NGO ने कहा कि सुरक्षित पेयजल तक पहुंच का संबंध जीवन, स्वास्थ्य, भोजन, आवास, सम्मान और विकास जैसे अधिकारों से है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भी 2010 में सुरक्षित और स्वच्छ पेयजल तथा स्वच्छता के अधिकार को मानवाधिकार के रूप में मान्यता देने वाली Resolution 64/292 को अपनाया था।
NGO का तर्क है कि 1960 के बाद से क्षेत्र की परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया है। इसमें जनसंख्या वृद्धि, जलवायु परिवर्तन, ग्लेशियरों में बदलाव, भूजल स्तर में गिरावट और नदी प्रवाह में अनिश्चितता जैसे मुद्दे शामिल हैं।
पाकिस्तान के लिए क्यों महत्वपूर्ण है सिंधु नदी तंत्र?
सिंधु नदी प्रणाली पाकिस्तान की कृषि और जल व्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। भारत सरकार के एक दस्तावेज के अनुसार पाकिस्तान की लगभग 16 मिलियन हेक्टेयर कृषि भूमि में से करीब 80 प्रतिशत सिंधु नदी प्रणाली पर निर्भर है और देश के कुल जल उपयोग का बड़ा हिस्सा इसी प्रणाली से जुड़ा है।
इसी वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच संधि की मौजूदा स्थिति का असर सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं है। जल प्रवाह, सिंचाई, बिजली उत्पादन और खाद्य सुरक्षा जैसे मुद्दे भी इससे जुड़े हैं।
हालांकि, यह कहना अभी सही नहीं होगा कि पाकिस्तान में सूखा निश्चित रूप से आने वाला है। संभावित असर इस बात पर निर्भर करेगा कि भविष्य में भारत की परियोजनाएं किस स्तर पर विकसित होती हैं, नदी प्रवाह में कितना बदलाव आता है, मौसम की स्थिति कैसी रहती है और दोनों देशों के बीच जल प्रबंधन किस तरह आगे बढ़ता है।
भारत-पाकिस्तान के बीच पानी का विवाद आगे कहां जाएगा?
फिलहाल स्थिति यह है कि भारत सिंधु जल संधि को abeyance में रखने के अपने फैसले पर कायम है, जबकि Court of Arbitration ने संधि को लागू मानते हुए भारत से उसकी शर्तों के पालन की बात कही है। दोनों पक्ष इस मामले की कानूनी स्थिति को अलग-अलग तरीके से देखते हैं।
इसी बीच UNHRC में संधि की समीक्षा की मांग ने इस विवाद को एक नया मानवाधिकार और जल-सुरक्षा आयाम दे दिया है। आने वाले समय में सिंधु जल संधि का भविष्य भारत-पाकिस्तान संबंधों के साथ-साथ क्षेत्रीय जल सुरक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दा बना रहेगा।

























