
पंजाब कांग्रेस में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच पार्टी हाईकमान ने बड़ा संगठनात्मक बदलाव किया है। कांग्रेस ने 5 सितंबर को सचिन पायलट को पंजाब का नया AICC महासचिव प्रभारी नियुक्त किया है। वहीं, पंजाब के प्रभारी रहे भूपेश बघेल को अब असम की जिम्मेदारी दी गई है।
यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब पंजाब कांग्रेस में अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के समर्थकों के बीच गुटबाजी खुलकर सामने आ चुकी है। ऐसे में पायलट की नियुक्ति को पार्टी संगठन में नई जान फूंकने और दोनों खेमों के बीच तालमेल बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
बघेल की जगह पायलट को क्यों मिली जिम्मेदारी?
भूपेश बघेल को फरवरी 2025 में पंजाब कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया था। उनकी जिम्मेदारी प्रदेश संगठन को मजबूत करने और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल बनाने की थी। हालांकि, समय के साथ पंजाब कांग्रेस में मतभेद कम होने के बजाय ज्यादा खुलकर सामने आने लगे।
खास तौर पर 1 जुलाई के बाद पार्टी के भीतर विवाद बढ़ा। हाईकमान ने अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाए रखा, जबकि चरणजीत सिंह चन्नी को चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच खींचतान तेज हो गई।
चन्नी और वड़िंग खेमे में बढ़ा विवाद
पंजाब कांग्रेस के संगठनात्मक अभियान ‘हर बूथ, कांग्रेस मजबूत’ के दौरान गुटबाजी खुलकर सामने आई। कई जगह चन्नी और वड़िंग समर्थकों के बीच नारेबाजी और विवाद की घटनाएं सामने आईं।
अगस्त में तो स्थिति इतनी बिगड़ गई कि कुछ जगहों पर दोनों खेमों के समर्थकों के बीच टकराव और पोस्टर वॉर देखने को मिला। मुक्तसर में वड़िंग और भूपेश बघेल के खिलाफ पोस्टर भी लगाए गए, जबकि दूसरे स्थानों पर चन्नी के समर्थन में नारे लगाए गए।
बघेल के दौरों से भी नहीं थमी गुटबाजी
पंजाब में संगठन को मजबूत करने के लिए भूपेश बघेल ने कई दौरे किए। 31 जुलाई से 8 अगस्त तक चले उनके संगठनात्मक दौरे का उद्देश्य पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करना था, लेकिन इस दौरान भी गुटबाजी और आपसी टकराव की खबरें सामने आती रहीं।
पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि चुनाव से पहले नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक मंच पर कैसे लाया जाए।
अब सचिन पायलट के सामने क्या चुनौती है?
सचिन पायलट को अब पंजाब कांग्रेस में कई मोर्चों पर काम करना होगा। सबसे बड़ी चुनौती चन्नी और वड़िंग खेमों के बीच तालमेल बनाना और पार्टी नेताओं को एकजुट करना होगी।
इसके साथ ही उन्हें संगठन को मजबूत करने, चुनावी रणनीति तैयार करने और 2027 के पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी को जमीन पर सक्रिय करने की जिम्मेदारी भी संभालनी होगी।
पायलट के पास राजस्थान में संगठन और आंतरिक राजनीतिक संघर्ष का अनुभव रहा है। कांग्रेस हाईकमान को उम्मीद है कि वह पंजाब में चल रही गुटबाजी को संभालकर पार्टी को एकजुट चुनाव अभियान की दिशा में ले जा सकेंगे।
राहुल गांधी की बैठक के बाद आया बदलाव
सचिन पायलट की नियुक्ति से एक दिन पहले राहुल गांधी ने दिल्ली में पंजाब कांग्रेस के नेताओं के साथ अहम बैठक की थी। बैठक में प्रदेश संगठन की स्थिति और लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान पर चर्चा हुई थी। इसके तुरंत बाद पायलट को पंजाब की जिम्मेदारी सौंपे जाने से इस बदलाव को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
2027 चुनाव से पहले कांग्रेस के लिए बड़ी चुनौती
पंजाब में अगला विधानसभा चुनाव 2027 में होना है। ऐसे में कांग्रेस के पास संगठन को मजबूत करने और अंदरूनी मतभेद दूर करने के लिए सीमित समय है।
पार्टी के सामने आम आदमी पार्टी के अलावा अन्य राजनीतिक दलों की भी चुनौती है। ऐसे में सचिन पायलट के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि क्या वह पंजाब कांग्रेस के अलग-अलग गुटों को एक मंच पर ला पाएंगे और पार्टी को चुनावी मुकाबले के लिए तैयार कर पाएंगे।



























