
महाराष्ट्र में खाद्य और दवा सुरक्षा को लेकर लगातार सख्त कार्रवाई कर रहे FDA कमिश्नर तुकाराम मुंढे को बॉम्बे हाईकोर्ट की कड़ी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा है। मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (MCA) परिसर के पांच रेस्टोरेंट्स और पुणे में सिप्ला की यूनिट से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान अदालत ने महाराष्ट्र Food and Drug Administration (FDA) के रवैये पर सवाल उठाए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने FDA से यहां तक पूछ लिया, “Do you feel you are a Lord and you can do anything?” अदालत ने अधिकारियों को जरूरत से ज्यादा तकनीकी और कठोर रुख अपनाने के बजाय व्यावहारिक और संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी।
क्या है MCA के पांच रेस्टोरेंट्स का मामला?
मामला मुंबई के Bandra-Kurla Complex स्थित मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन परिसर में संचालित पांच रेस्टोरेंट्स से जुड़ा है। FDA की जांच के बाद इन प्रतिष्ठानों के लाइसेंस निलंबित किए गए थे।
इसके बाद हुई एक नई जांच में इन पांच रेस्टोरेंट्स को खाद्य सुरक्षा नियमों के मामले में करीब 88 फीसदी अनुपालन वाला पाया गया। इसके बावजूद FDA की ओर से निलंबन जारी रखने पर अदालत ने सवाल उठाए।
FDA की एक आपत्ति यह भी थी कि रेस्टोरेंट्स का संचालन एक तीसरी कंपनी, Shirke Infrastructure, द्वारा किया जा रहा था, जबकि लाइसेंस MCA के नाम पर थे। हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर उचित प्रक्रिया अपनाने और संबंधित पक्ष को सुनवाई का अवसर देने पर जोर दिया।
कोर्ट ने क्यों लगाई फटकार?
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने FDA के रवैये को ‘pedantic’ यानी जरूरत से ज्यादा तकनीकी बताया और अधिकारियों को ‘pragmatic’ यानी व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की सलाह दी।
अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि उसके निर्देशों की अनदेखी की गई तो अधिकारियों को अवमानना की कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इसके बाद FDA ने पांचों रेस्टोरेंट्स के निलंबन आदेश को वापस लेने की बात कही और नए सिरे से MCA को नोटिस देकर संबंधित मुद्दे पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। इसके बाद रेस्टोरेंट्स को दोबारा संचालन की अनुमति मिली।
Cipla मामले में भी FDA को पीछे हटना पड़ा
इसी सुनवाई के दौरान पुणे स्थित Cipla Pharma & Life Sciences की Carrying and Forwarding (C&F) यूनिट का मामला भी सामने आया।
FDA ने 27 अगस्त को यूनिट का ड्रग बिक्री लाइसेंस रद्द किया था। विभाग के मुताबिक, जांच में Reactin Plus Tablets की पैकेजिंग, स्टोरेज, रिकॉर्ड-कीपिंग और रिकॉल प्रक्रिया से जुड़ी कई अनियमितताएं सामने आई थीं। FDA ने यह भी कहा था कि कुछ दवाएं सीधे फर्श पर रखी मिलीं और स्टॉक रिकॉर्ड में भी विसंगतियां थीं।
हालांकि Cipla ने FDA की कार्रवाई को चुनौती दी और कहा कि मामला न्यायिक प्रक्रिया में है। कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया कि FDA की कार्रवाई उसके उत्पादों की सुरक्षा, गुणवत्ता या प्रभावशीलता पर कोई आरोप नहीं लगाती।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद FDA ने Cipla यूनिट का लाइसेंस रद्द करने वाला आदेश भी वापस लेने की बात कही।
क्या तुकाराम मुंढे के लिए यह व्यक्तिगत झटका है?
इसे तुकाराम मुंढे के लिए सीधा व्यक्तिगत या सेवा संबंधी झटका कहना सही नहीं होगा। हाईकोर्ट ने न तो उन्हें पद से हटाने का आदेश दिया है और न ही उनके खिलाफ व्यक्तिगत दंडात्मक कार्रवाई का निर्देश दिया है।
हालांकि, प्रशासनिक स्तर पर यह मामला FDA के लिए जरूर महत्वपूर्ण झटका माना जा सकता है। खासकर इसलिए क्योंकि अदालत की कड़ी टिप्पणियों के बाद विभाग को अपने दो प्रमुख आदेशों पर पीछे हटना पड़ा।
क्या FDA की शुरुआती कार्रवाई पूरी तरह गलत थी?
ऐसा निष्कर्ष निकालना भी जल्दबाजी होगा। FDA का कहना था कि उसे निरीक्षण के दौरान खाद्य सुरक्षा और दवा संबंधी नियमों में कमियां मिली थीं, जिसके आधार पर कार्रवाई की गई।
लेकिन अदालत का जोर इस बात पर था कि प्रशासनिक कार्रवाई करते समय कानून के साथ उचित प्रक्रिया, प्राकृतिक न्याय और परिस्थितियों का व्यावहारिक आकलन भी जरूरी है।
MCA के मामले में नई जांच में 88 फीसदी अनुपालन सामने आने के बाद भी निलंबन जारी रखने के FDA के फैसले पर अदालत ने सवाल उठाए। वहीं Cipla मामले में भी अदालत ने FDA के कार्रवाई के तरीके और प्रक्रिया को लेकर कड़ी टिप्पणी की।
मुंढे की ‘सख्त कार्रवाई’ पर अब उठेंगे सवाल?
तुकाराम मुंढे की पहचान प्रशासनिक स्तर पर सख्त कार्रवाई करने वाले अधिकारी के तौर पर रही है। ऐसे में हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणियां FDA की कार्रवाई के तरीके को लेकर नई बहस जरूर खड़ी करती हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि खाद्य और दवा सुरक्षा से जुड़े नियमों का पालन सुनिश्चित करना FDA की जिम्मेदारी है। इसलिए असली सवाल यह है कि कठोर कार्रवाई और उचित कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
फिलहाल हाईकोर्ट की फटकार के बाद FDA को अपने रुख में बदलाव करना पड़ा है। ऐसे में इसे तुकाराम मुंढे की कार्रवाई की रफ्तार पर न्यायिक ब्रेक जरूर कहा जा सकता है, लेकिन इसे उनके पद या व्यक्तिगत करियर पर फैसला मानना सही नहीं होगा।



























