झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहा विवाद अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की ओर से 22 भर्ती परीक्षाओं और चयन प्रक्रियाओं को रद्द करने के फैसले पर फिलहाल रोक लगा दी है। सरकार ने 18 अगस्त को अधिसूचना जारी कर कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने, कुछ परीक्षाओं को जांच पूरी होने तक रोकने और पुरानी भर्तियों को CID जांच के दायरे में रखने का फैसला लिया था।
सरकार के इस फैसले से उन अभ्यर्थियों के भविष्य पर भी सवाल खड़े हो गए थे, जो परीक्षा पास करने के बाद सरकारी नौकरी हासिल कर चुके हैं। अब हाईकोर्ट की रोक के बाद ऐसे अभ्यर्थियों को फिलहाल राहत मिली है। हालांकि, मामले की अगली सुनवाई में राज्य सरकार को अपना पक्ष अदालत के सामने रखना होगा।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ी और अनियमितताओं की जांच के बीच झारखंड सरकार ने JPSC, JSSC और परीक्षा संचालन से जुड़ी एजेंसियों की कई परीक्षाओं पर कार्रवाई की थी।
सरकार के फैसले के तहत 22 भर्ती परीक्षाओं को रद्द किया गया, जबकि 6 परीक्षाओं को जांच पूरी होने तक रोक दिया गया। इसके अलावा 17 पुरानी JPSC भर्तियों को CID जांच के दायरे में रखा गया।
इस फैसले का असर उन उम्मीदवारों पर भी पड़ा, जिन्हें परीक्षा में सफलता के बाद सरकारी नियुक्ति मिल चुकी थी। इनमें 11वीं-13वीं झारखंड संयुक्त सिविल सेवा परीक्षा के तहत 342 नियुक्तियां, JSSC-CGL के तहत 1932 नियुक्तियां, बाल विकास परियोजना पदाधिकारी के 64 पद और फूड सेफ्टी ऑफिसर के 56 पद शामिल हैं।
चयनित अभ्यर्थियों की बढ़ी चिंता
भर्ती परीक्षाएं रद्द होने के बाद पहले से सरकारी सेवा में काम कर रहे अभ्यर्थियों के सामने भी अपने भविष्य को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई थी। चयनित उम्मीदवारों का कहना था कि उन्होंने तय प्रक्रिया के तहत परीक्षा दी, उसे पास किया और उसके बाद सरकारी सेवा में नियुक्त हुए।
अभ्यर्थियों का सवाल था कि अगर किसी भर्ती परीक्षा में अनियमितता हुई है तो दोषी लोगों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। बिना व्यक्तिगत भूमिका की जांच किए पूरी भर्ती और नियुक्तियों को रद्द करना उचित नहीं है।
हाईकोर्ट में क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि सरकार ने परीक्षा और उसके आधार पर हुई नियुक्तियों को रद्द करने से पहले प्रभावित अभ्यर्थियों का पक्ष नहीं सुना।
अभ्यर्थियों का कहना है कि यदि किसी उम्मीदवार के खिलाफ गड़बड़ी का कोई ठोस सबूत नहीं है, तो केवल पूरी परीक्षा में कथित अनियमितता के आधार पर उसकी नियुक्ति रद्द नहीं की जानी चाहिए। याचिकाकर्ताओं ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का भी हवाला दिया।
अब आगे क्या होगा?
फिलहाल हाईकोर्ट की रोक से उन अभ्यर्थियों को तत्काल राहत मिली है, जिनकी नौकरी या चयन प्रक्रिया सरकार के फैसले से प्रभावित हुई थी। हालांकि, यह रोक अंतिम फैसला नहीं है। मामले की अगली सुनवाई में अदालत सरकार का पक्ष भी सुनेगी और इसके बाद आगे की स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
वहीं, सरकार ने भर्ती प्रक्रियाओं में सुधार और कथित अनियमितताओं पर निगरानी बढ़ाने के लिए कई कदम उठाने की बात कही है। JPSC और JSSC से जुड़े मामलों की जल्द सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाने का अनुरोध करने और दोनों आयोगों में आंतरिक मॉनिटरिंग या विजिलेंस सेल गठित करने की योजना भी बताई गई है।
ऐसे में अब सभी की नजर हाईकोर्ट की अगली सुनवाई और अंतिम आदेश पर टिकी है।




























