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रखड़ पुणिया का राजनीतिक मंच: कैसे पंजाब की राजनीति का दिशा-सूचक बना एक पवित्र त्योहार

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Rakhad puneya

हर साल रक्षाबंधन (रखड़ पुणिया) के पवित्र अवसर पर अमृतसर जिले का ऐतिहासिक शहर बाबा बकाला साहिब एक शांत धार्मिक स्थल से पंजाब की राजनीति के सबसे बड़े केंद्र में बदल जाता है। नौवें सिख गुरु, श्री गुरु तेग बहादुर जी की पावन तपोभूमि रहे बाबा बकाला साहिब में जहां एक ओर लाखों श्रद्धालु नतमस्तक होने पहुंचते हैं, वहीं दूसरी ओर दशकों से चली आ रही राजनीतिक सम्मेलनों की परंपरा इसे बेहद खास बनाती है।

पंजाब की अनूठी सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति में धार्मिक मेलों को राजनीतिक संदेश देने का प्रमुख जरिया माना जाता रहा है। श्री मुक्तसर साहिब के माघी मेले, फतेहगढ़ साहिब के शहीदी जोड़ मेले और आनंदपुर साहिब की बैसाखी की तरह ही, बाबा बकाला का रखड़ पुणिया मेला रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण ‘माझा’ क्षेत्र का वार्षिक राजनीतिक रिपोर्ट कार्ड पेश करता है।

बाबा बकाला के राजनीतिक सम्मेलनों की परंपरा

बाबा बकाला में रखड़ पुणिया के दौरान राजनीतिक रैलियां आयोजित करने का इतिहास स्वतंत्रता-पूर्व काल से जुड़ा है, लेकिन 1947 के बाद इसने एक सुव्यवस्थित रूप ले लिया। ग्रामीण इलाकों से आने वाले किसानों, मजदूरों और बुजुर्गों के विशाल जनसमूह ने राजनीतिक दलों को अपनी बात सीधे जनता तक पहुंचाने का एक तैयार मंच प्रदान किया।

शहरी सम्मेलनों या बंद प्रेक्षागृहों (auditoriums) की तुलना में बाबा बकाला के मंच का माहौल बिल्कुल अलग होता है:

  • शक्ति प्रदर्शन की होड़: मुख्य राजनीतिक दल एक-दूसरे से कुछ ही सौ मीटर की दूरी पर विशाल पांडाल (टेंट) लगाते हैं।
  • संगठन की परीक्षा: आगामी विधानसभा या लोकसभा चुनावों से पहले पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं को लामबंद करने और जनसमूह का आकार मापकर अपनी ताकत का आंकलन करने के लिए इस मंच का उपयोग करती हैं।
  • भविष्य की राजनीति का एजेंडा: रखड़ पुणिया के मंचों से दिए जाने वाले भाषण अक्सर पंजाब में आने वाले महीनों की राजनीतिक दिशा तय करते हैं।

दशकों तक यह आयोजन शिरोमणि अकाली दल (SAD) और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बीच शक्ति-प्रदर्शन का मुख्य जरिया रहा। अकाली दल बाबा बकाला को अपनी पंथिक पहचान और किसान-हितैषी छवि मजबूत करने के लिए इस्तेमाल करता था, जबकि कांग्रेस इसका इस्तेमाल प्रशासनिक स्थिरता और अकाली दल के असर को कम करने के लिए करती थी।

अतीत के पन्नों से: कैसे बदला बाबा बकाला का मंच

बाबा बकाला के राजनीतिक महत्व को समझने के लिए इसके इतिहास के प्रमुख मोड़ों को देखना आवश्यक है:

1. द्विध्रुवीय दौर: अकाली दल बनाम कांग्रेस

1990 और 2000 के दशकों में बाबा बकाला में जुटने वाली भीड़ को राज्य के राजनीतिक मूड का सटीक मापदंड माना जाता था। यदि अकाली दल का पांडाल बड़ा होता, तो उसे माझा में पंथिक लहर का संकेत माना जाता था; वहीं कांग्रेस के पांडाल में भीड़ का जुटना सत्ताधारी दल के खिलाफ ग्रामीण असंतोष को दर्शाता था। उस दौर में मुख्य मुद्दे पानी के बंटवारे, संघीय अधिकार, कृषि संकट और राज्य के कर्ज से जुड़े होते थे।

2. 2014-2017: तीसरी शक्ति का उभार

2014 के बाद आम आदमी पार्टी (AAP) के पंजाब में प्रवेश ने पारंपरिक दो-दलीय व्यवस्था को तोड़ दिया। 2015 के रखड़ पुणिया मेले में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी की बेअदबी की घटनाओं और पुलिस गोलीबारी के बाद उपजे जन-आक्रोश के बीच आम आदमी पार्टी ने बाबा बकाला में एक विशाल रैली की। इस रैली ने आप को पंजाब में मुख्य विपक्षी दल के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई।

3. 2022 के बाद का बहुकोणीय समीकरण

2022 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी की ऐतिहासिक जीत के बाद बाबा बकाला के मंच के समीकरण पूरी तरह बदल गए:

  • AAP की सत्ताधारी भूमिका: आम आदमी पार्टी अब इस मंच का उपयोग अपनी सरकार की उपलब्धियों जैसे 300 यूनिट मुफ्त बिजली, आम आदमी क्लिनिक, शिक्षा सुधार और नौकरियों का ब्योरा देने के लिए करती है।
  • अकाली दल का पुनरुत्थान प्रयास: शिरोमणि अकाली दल अपने पारंपरिक पंथिक आधार को फिर से संगठित करने और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दे उठाने के लिए बाबा बकाला का इस्तेमाल कर रहा है।
  • भाजपा की स्वतंत्र उपस्थिति: 2020-21 के किसान आंदोलन के बाद अकाली-भाजपा गठबंधन टूटने पर भाजपा ने बाबा बकाला में अपना अलग मंच लगाना शुरू किया है, जहां केंद्रीय नेता पंजाब में पार्टी के स्वतंत्र आधार के विस्तार का संदेश देते हैं।
  • विभिन्न पंथिक धड़ों का उभार: हाल के वर्षों में पारंपरिक दलों के अलावा विभिन्न पंथिक और क्षेत्रीय समूह भी अपने अलग मंच लगाकर “पंथ बचाओ” का नारा देते नजर आते हैं।

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