जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रसंघ चुनाव को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज है। विश्वविद्यालय में आखिरी बार छात्रसंघ चुनाव वर्ष 2006 में हुए थे। इसके बाद छात्रसंघ को भंग कर दिया गया और करीब दो दशक बाद भी छात्र संगठन चुनाव बहाली की मांग उठा रहे हैं।
छात्रों का कहना है कि कैंपस में उनकी सामूहिक समस्याओं को प्रभावी ढंग से उठाने के लिए एक निर्वाचित छात्रसंघ जरूरी है। वहीं, छात्रसंघ चुनाव की बहाली को लेकर पिछले वर्षों में कई बार आंदोलन और विरोध प्रदर्शन भी हो चुके हैं।
2006 में भंग हुआ था छात्रसंघ
जामिया में वर्ष 2006 के दौरान प्रशासन और छात्रों के बीच गतिरोध बढ़ने तथा हिंसक घटनाओं के बाद छात्रसंघ को भंग कर दिया गया था।
इसके बाद विश्वविद्यालय में छात्र प्रतिनिधित्व के दूसरे तरीके लागू किए गए, लेकिन छात्रों का एक वर्ग लगातार निर्वाचित छात्रसंघ की बहाली की मांग करता रहा।
2012 में फिर उठी चुनाव कराने की मांग
छात्रसंघ चुनाव दोबारा कराने की मांग वर्ष 2012 में भी उठी। इसी सिलसिले में छात्र हमीदुर्रहमान ने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था।
छात्रों के अनुसार, उस समय विश्वविद्यालय प्रशासन ने अदालत के समक्ष चुनाव कराने के लिए परिस्थितियों को अनुकूल नहीं बताया था।
2017 में आंदोलन और हड़ताल
वर्ष 2017 में भी छात्रसंघ चुनाव बहाल करने की मांग को लेकर छात्रों ने प्रदर्शन और हड़ताल की।
छात्रों के मुताबिक, उस समय विश्वविद्यालय की ओर से अदालत में मामला लंबित होने का हवाला दिया गया था। इससे चुनाव बहाली का मुद्दा आगे नहीं बढ़ सका।
2022 के बाद भी चुनाव बहाली का इंतजार
छात्रों का दावा है कि वर्ष 2022 में अदालत से संबंधित मामला सुलझने के बाद भी छात्रसंघ चुनाव कराने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
इसके बाद से अलग-अलग छात्र संगठन और छात्र लगातार चुनाव बहाल करने की मांग करते रहे हैं।
विषय प्रतिनिधियों की व्यवस्था पर भी सवाल
कैंपस के कुछ छात्रों का कहना है कि मौजूदा ‘विषय प्रतिनिधि’ व्यवस्था छात्रों की सामूहिक समस्याओं को प्रभावी तरीके से उठाने में सक्षम नहीं है।
छात्रों के मुताबिक, इस व्यवस्था में विषय संघों के अध्यक्ष विभागाध्यक्ष होते हैं। ऐसे में हॉस्टल में खाने की गुणवत्ता, फीस और अन्य छात्र समस्याओं को लेकर एक निर्वाचित छात्रसंघ की जरूरत महसूस होती है।
2026 में फिर चर्चा में आया जामिया
अप्रैल 2026 में परिसर में आरएसएस द्वारा आयोजित ‘युवा कुंभ’ कार्यक्रम को लेकर विभिन्न छात्र संगठनों ने विरोध किया था। इस दौरान छात्रों और सुरक्षा गार्डों के बीच झड़प की खबर सामने आई थी।
इस घटना ने एक बार फिर कैंपस में छात्र संगठनों की भूमिका और छात्र प्रतिनिधित्व के सवाल को चर्चा में ला दिया।
2019 में CAA विरोध के दौरान विवाद
दिसंबर 2019 में नागरिकता संशोधन कानून यानी CAA के विरोध के दौरान जामिया परिसर में पुलिस और छात्रों के बीच झड़प हुई थी। घटना के दौरान आंसू गैस के इस्तेमाल को लेकर देशभर में विवाद हुआ था।
2025 में परीक्षा के सवाल को लेकर विवाद
दिसंबर 2025 में सोशल वर्क विभाग की परीक्षा में अल्पसंख्यकों पर अत्याचार से जुड़े सवाल को लेकर विवाद हुआ था। इसके बाद प्रशासन की ओर से प्रोफेसर वीरेंद्र बालाजी सहारे के निलंबन की जानकारी सामने आई थी।
2011 में अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा चर्चा में
फरवरी 2011 में जामिया को अल्पसंख्यक संस्थान घोषित किए जाने के बाद विभिन्न छात्र संगठनों और राजनीतिक दलों की ओर से विरोध की खबरें सामने आई थीं।
1992 में भी विवादों में रहा जामिया
वर्ष 1992 में तत्कालीन प्रोफेसर मुशीरुल हसन द्वारा सलमान रुश्दी की किताब पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध के बाद कुछ संगठनों और छात्रों की ओर से विरोध प्रदर्शन हुआ था। प्रदर्शनकारियों ने उनके इस्तीफे की मांग की थी।
20 साल बाद भी चुनाव का सवाल बरकरार
जामिया में छात्रसंघ चुनाव को लेकर विवाद और मांग नई नहीं है। वर्ष 2006 में छात्रसंघ भंग होने के बाद 2012, 2017 और 2022 के बाद भी चुनाव बहाली की मांग अलग-अलग समय पर सामने आती रही है।
अब छात्रों की नजर इस बात पर है कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ चुनाव को लेकर भविष्य में क्या फैसला करता है और क्या करीब दो दशक बाद जामिया में फिर से लोकतांत्रिक छात्र प्रतिनिधित्व की व्यवस्था बहाल होगी।



























